kva tadīyaratirbhāryā kvāyamātmā nabhaśchadiḥ|| 13
अर्थ
यह शरीर अन्तमें कीड़े, विष्ठा या राखकी ढेरी होकर रहेगा। कहाँ तो यह तुच्छ शरीर और इसके लिये जिसमें आसक्ति होती है वह स्त्री, और कहाँ अपनी महिमासे आकाशको भी ढक रखनेवाला अनन्त आत्मा!॥ १३॥✎ 637
कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम्।
क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः॥ १३
यह शरीर अन्तमें कीड़े, विष्ठा या राखकी ढेरी होकर रहेगा। कहाँ तो यह तुच्छ शरीर और इसके लिये जिसमें आसक्ति होती है वह स्त्री, और कहाँ अपनी महिमासे आकाशको भी ढक रखनेवाला अनन्त आत्मा!॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.14.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 890) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/14/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)