vyapetaṃ lokaśāstrābhyāṃ bhavān hi bhagavatparaḥ|| 45
अर्थ
प्रह्लादजी! मेरी यह आत्मकथा अत्यन्त गुप्त एवं लोक और शास्त्रसे परेकी वस्तु है। तुम भगवान्के अत्यन्त प्रेमी हो, इसलिये मैंने तुम्हारे प्रति इसका वर्णन किया है॥ ४५॥
स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमपि वर्णितम्।
व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्परः॥ ४५
प्रह्लादजी! मेरी यह आत्मकथा अत्यन्त गुप्त एवं लोक और शास्त्रसे परेकी वस्तु है। तुम भगवान्के अत्यन्त प्रेमी हो, इसलिये मैंने तुम्हारे प्रति इसका वर्णन किया है॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.13.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 888) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/13/45/