॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.13.40
क्वचिच्छये धरोपस्थे तृणपर्णाश्मभस्मसु।
क्वचित् प्रासादपर्यङ्के कशिपौ वा परेच्छया॥ ४०
kvacicchaye dharopasthe tṛṇaparṇāśmabhasmasu|
kvacit prāsādaparyaṅke kaśipau vā parecchayā|| 40
अर्थ
कभी मैं पृथ्वी, घास, पत्ते, पत्थर या राखके ढेरपर ही पड़ा रहता हूँ, तो कभी दूसरोंकी इच्छासे महलोंमें पलँगों और गद्दोंपर सो लेता हूँ॥ ४०॥