श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.12.29

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

मनो मनोरथैश्‍चन्द्रे३ बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे।

कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंममताक्रिया।

सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे॥ २९

mano manorathaiścandre buddhiṃ bodhyaiḥ kavau pare|

karmāṇyadhyātmanā rudre yadahaṃmamatākriyā|

sattvena cittaṃ kṣetrajñe guṇairvaikārikaṃ pare|| 29

अर्थ

मनोरथोंके साथ मनको चन्द्रमामें, समझमें आनेवाले पदार्थोंके सहित बुद्धिको ब्रह्मामें तथा अहंता और ममतारूप क्रिया करनेवाले अहंकारको उसके कर्मोंके साथ रुद्रमें लीन कर दे। इसी प्रकार चेतना-सहित चित्तको क्षेत्रज्ञ (जीव)-में और गुणोंके कारण विकारी-से प्रतीत होनेवाले जीवको परब्रह्ममें लीन कर दे॥ २९॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—मनोरथे शुद्धे बुद्धौ वाचं तथार्पयेत्।

    (मुद्रित पृष्ठ 882)

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें