॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.12.25
खे खानि वायौ निःश्वासांस्तेजस्यूष्माणमात्मवान्।
अप्स्वसृक्श्लेष्मपूयानि क्षितौ शेषं यथोद्भवम्॥ २५
khe khāni vāyau niḥśvāsāṃstejasyūṣmāṇamātmavān|
apsvasṛkśleṣmapūyāni kṣitau śeṣaṃ yathodbhavam|| 25
अर्थ
जितेन्द्रिय पुरुष अपने शरीरके छिद्राकाशोंको आकाशमें, प्राणोंको वायुमें, गरमीको अग्निमें, रक्त, कफ, पीब आदि जलीय तत्त्वोंको जलमें और हड्डी आदि ठोस वस्तुओंको पृथ्वीमें लीन करे॥ २५॥