श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.33

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

उप्यमानं मुहुः क्षेत्रं स्वयं निर्वीर्यतामियात्।

न कल्पते पुनः सूत्यै उप्तं बीजं च नश्यति॥ ३३

upyamānaṃ muhuḥ kṣetraṃ svayaṃ nirvīryatāmiyāt|

na kalpate punaḥ sūtyai uptaṃ bījaṃ ca naśyati|| 33

अर्थ

महाराज! जिस प्रकार बार-बार बोनेसे खेत स्वयं ही शक्तिहीन हो जाता है और उसमें अंकुर उगना बंद हो जाता है, यहाँतक कि उसमें बोया हुआ बीज भी नष्ट हो जाता है—उसी प्रकार यह चित्त, जो वासनाओंका खजाना है, विषयोंका अत्यन्त सेवन करनेसे स्वयं ही ऊब जाता है। परन्तु स्वल्प भोगोंसे ऐसा नहीं होता। जैसे एक-एक बूँद घी डालनेसे आग नहीं बुझती, परन्तु एक ही साथ अधिक घी पड़ जाय तो वह बुझ जाती है॥ ३३-३४॥

यह अर्थ श्लोक 33–34 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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