श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.11.24

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

शूद्रस्य संनतिः शौचं सेवा स्वामिन्यमायया।

अमन्त्रयज्ञो ह्यस्तेयं सत्यं गोविप्ररक्षणम्॥ २४

śūdrasya saṃnatiḥ śaucaṃ sevā svāminyamāyayā|

amantrayajño hyasteyaṃ satyaṃ goviprarakṣaṇam|| 24

अर्थ

उच्च वर्णोंके सामने विनम्र रहना, पवित्रता, स्वामीकी निष्कपट सेवा, वैदिक मन्त्रोंसे रहित यज्ञ, चोरी न करना, सत्य तथा गौ, ब्राह्मणोंकी रक्षा करना—ये शूद्रके लक्षण हैं॥ २४॥

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