युधिष्ठिरजीने कहा—भगवन्! अब मैं वर्ण और आश्रमोंके सदाचारके साथ मनुष्योंके सनातनधर्मका श्रवण करना चाहता हूँ, क्योंकि धर्मसे ही मनुष्यको ज्ञान, भगवत्प्रेम और साक्षात् परम पुरुष भगवान्की प्राप्ति होती है॥ २॥✎ 635
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनातनम्।
वर्णाश्रमाचारयुतं यत् पुमान्विन्दते परम्॥ २
युधिष्ठिरजीने कहा—भगवन्! अब मैं वर्ण और आश्रमोंके सदाचारके साथ मनुष्योंके सनातनधर्मका श्रवण करना चाहता हूँ, क्योंकि धर्मसे ही मनुष्यको ज्ञान, भगवत्प्रेम और साक्षात् परम पुरुष भगवान्की प्राप्ति होती है॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.11.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 875) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/11/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)