॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.11.14
विप्रस्याध्ययनादीनि षडन्यस्याप्रतिग्रहः।
राज्ञो वृत्तिः प्रजागोप्तुरविप्राद् वा करादिभिः॥ १४
viprasyādhyayanādīni ṣaḍanyasyāpratigrahaḥ|
rājño vṛttiḥ prajāgopturaviprād vā karādibhiḥ|| 14
अर्थ
अध्ययन, अध्यापन, दान लेना, दान देना और यज्ञ करना, यज्ञ कराना—ये छः कर्म ब्राह्मणके हैं। क्षत्रियको दान नहीं लेना चाहिये। प्रजाकी रक्षा करनेवाले क्षत्रियका जीवन-निर्वाह ब्राह्मणके सिवा और सबसे यथायोग्य कर तथा दण्ड (जुर्माना) आदिके द्वारा होता है॥ १४॥