युधिष्ठिर! यही एकमात्र आराध्यदेव हैं। प्राचीन कालमें बहुत बड़े मायावी मयासुरने जब रुद्रदेवकी कमनीय कीर्तिमें कलंक लगाना चाहा था, तब इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने फिरसे उनके यशकी रक्षा और विस्तार किया था॥ ५१॥
स एष भगवान्राजन्व्यतनोद् विहतं यशः।
पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना॥ ५१
युधिष्ठिर! यही एकमात्र आराध्यदेव हैं। प्राचीन कालमें बहुत बड़े मायावी मयासुरने जब रुद्रदेवकी कमनीय कीर्तिमें कलंक लगाना चाहा था, तब इन्हीं भगवान् श्रीकृष्णने फिरसे उनके यशकी रक्षा और विस्तार किया था॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 872) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/51/