॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 7.10.49
स३ वा अयं ब्रह्म महद्विमृग्य-
कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।
प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय
आत्मार्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च॥ ४९
sa vā ayaṃ brahma mahadvimṛgya-
kaivalyanirvāṇasukhānubhūtiḥ |
priyaḥ suhṛd vaḥ khalu mātuleya
ātmārhaṇīyo vidhikṛd guruśca|| 49
अर्थ
बड़े-बड़े महापुरुष निरन्तर जिनको ढूँढ़ते रहते हैं, जो मायाके लेशसे रहित परम शान्त परमानन्दानुभव-स्वरूप परब्रह्म परमात्मा हैं—वे ही तुम्हारे प्रिय, हितैषी, ममेरे भाई, पूज्य, आज्ञाकारी, गुरु और स्वयं आत्मा श्रीकृष्ण हैं॥ ४९॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—सर्वाश्रयं ब्रह्म।