दीनबन्धो! यद्यपि आपकी दृष्टि पड़ते ही वे पवित्र हो चुके, फिर भी मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उस जल्दी नाश न होनेवाले दुस्तर दोषसे मेरे पिता शुद्ध हो जायँ॥ १७॥
तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्।
पूतस्तेऽपाङ्गसंदृष्टस्तदा कृपणवत्सल॥ १७
दीनबन्धो! यद्यपि आपकी दृष्टि पड़ते ही वे पवित्र हो चुके, फिर भी मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि उस जल्दी नाश न होनेवाले दुस्तर दोषसे मेरे पिता शुद्ध हो जायँ॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.10.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 869) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/7/10/17/