श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.10.12

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

कथा मदीया जुषमाणः प्रियास्त्व-

मावेश्य मामात्मनि सन्तमेकम्।

सर्वेषु भूतेष्वधियज्ञमीशं

यजस्व योगेन च कर्म हिन्वन्॥ १२

kathā madīyā juṣamāṇaḥ priyāstva-

māveśya māmātmani santamekam|

sarveṣu bhūteṣvadhiyajñamīśaṃ

yajasva yogena ca karma hinvan|| 12

अर्थ

समस्त प्राणियोंके हृदयमें यज्ञोंके भोक्ता ईश्‍वरके रूपमें मैं ही विराजमान हूँ। तुम अपने हृदयमें मुझे देखते रहना और मेरी लीला-कथाएँ, जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय हैं, सुनते रहना। समस्त कर्मोंके द्वारा मेरी ही आराधना करना और इस प्रकार अपने प्रारब्ध-कर्मका क्षय कर देना॥ १२॥✎ 625

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #625 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीनृसिंहभगवान् ने → श्रीनृसिंहभगवान्‌ने

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