श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.28

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्‍वरे।

वैरेण पूतपाप्मानस्तमापुरनुचिन्तया॥ २८

evaṃ kṛṣṇe bhagavati māyāmanuja īśvare|

vaireṇa pūtapāpmānastamāpuranucintayā|| 28

अर्थ

यही बात भगवान् श्रीकृष्णके सम्बन्धमें भी है। लीलाके द्वारा मनुष्य मालूम पड़ते हुए ये सर्वशक्तिमान् भगवान् ही तो हैं। इनसे वैर करनेवाले भी इनका चिन्तन करते-करते पापरहित होकर इन्हींको प्राप्त हो गये॥ २८॥✎ 571 572 573 574 575 576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #573 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #574 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #575 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #576 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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