श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 7.1.26

सप्तम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात्।

न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः॥ २६

yathā vairānubandhena martyastanmayatāmiyāt|

na tathā bhaktiyogena iti me niścitā matiḥ|| 26

अर्थ

युधिष्ठिर! मेरा तो ऐसा दृढ़ निश्‍चय है कि मनुष्य वैरभावसे भगवान्‌में जितना तन्मय हो जाता है, उतना भक्तियोगसे नहीं होता॥ २६॥✎ 571 572 573 574 575 576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #571 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #572 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #573 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #574 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #575 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #576 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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