वहीं देवर्षि नारद भी बैठे हुए थे। इस घटनासे आश्चर्यचकित होकर राजा युधिष्ठिरने बड़े-बड़े मुनियोंसे भरी हुई सभामें; उस यज्ञमण्डपमें ही देवर्षि नारदसे यह प्रश्न किया॥ १४॥
तत्रासीनं सुरऋषिं राजा पाण्डुसुतः क्रतौ।
पप्रच्छ विस्मितमना मुनीनां शृण्वतामिदम्॥ १४
वहीं देवर्षि नारद भी बैठे हुए थे। इस घटनासे आश्चर्यचकित होकर राजा युधिष्ठिरने बड़े-बड़े मुनियोंसे भरी हुई सभामें; उस यज्ञमण्डपमें ही देवर्षि नारदसे यह प्रश्न किया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 7.1.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 807) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/7/1/14/