श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यत् ते गतीनां तिसॄणामीशितुः परमं पदम्।✎ 1087

नार्वाचीनो विसर्गस्य धातर्वेदितुमर्हति॥ ३२

yat te gatīnāṃ tisṝṇāmīśituḥ paramaṃ padam|

nārvācīno visargasya dhātarveditumarhati|| 32

अर्थ

विधातः! सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंके अनुसार जो उत्तम, मध्यम और निकृष्ट गतियाँ प्राप्त होती हैं, उनके नियामक आप ही हैं। आपके परमपदका वास्तविक स्वरूप इस कार्यरूप जगत‍्का कोई आधुनिक प्राणी नहीं जान सकता॥ ३२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1087 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तिसृणामीशितु: → तिसॄणामीशितुः

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें