॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.9.17
महता रौद्रदंष्ट्रेण जृम्भमाणं मुहुर्मुहुः।✎ 1084 1085
वित्रस्ता दुद्रुवुर्लोका वीक्ष्य सर्वे दिशो दश॥ १७
mahatā raudradaṃṣṭreṇa jṛmbhamāṇaṃ muhurmuhuḥ|
vitrastā dudruvurlokā vīkṣya sarve diśo daśa|| 17
अर्थ
वह बार-बार जँभाई लेता था। इससे जब उसका कन्दराके समान गम्भीर मुँह खुल जाता, तब जान पड़ता कि वह सारे आकाशको पी जायगा, जीभसे सारे नक्षत्रोंको चाट जायगा और अपनी विशाल एवं विकराल दाढ़ोंवाले मुँहसे तीनों लोकोंको निगल जायगा। उसके भयावने रूपको देखकर सब लोग डर गये और इधर-उधर भागने लगे॥ १६-१७॥