श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.2

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।

यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे॥ २

bhagavaṃstanmamākhyāhi varma nārāyaṇātmakam|

yathā''tatāyinaḥ śatrūn yena gupto'jayanmṛdhe|| 2

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! देवराज इन्द्रने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओंकी चतुरंगिणी सेनाको खेल-खेलमें—अनायास ही जीतकर त्रिलोकीकी राजलक्ष्मीका उपभोग किया, आप उस नारायणकवचको मुझे सुनाइये और यह भी बतलाइये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमिमें किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओंपर विजय प्राप्त की॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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