श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्वरूप बड़े तपस्वी थे। देवताओंसे ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगनके साथ उनकी पुरोहिती करने लगे॥ ३८॥
तेभ्य एवं प्रतिश्रुत्य विश्वरूपो महातपाः।
पौरोहित्यं वृतश्चक्रे परमेण समाधिना॥ ३८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! विश्वरूप बड़े तपस्वी थे। देवताओंसे ऐसी प्रतिज्ञा करके उनके वरण करनेपर वे बड़ी लगनके साथ उनकी पुरोहिती करने लगे॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 738) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/38/