॥ श्रीहरिः ॥
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम्।
अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः॥ ३०
dayāyā bhaginī mūrtirdharmasyātmātithiḥ svayam|
agnerabhyāgato mūrtiḥ sarvabhūtāni cātmanaḥ|| 30
अर्थ
(इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्निकी और जगत्के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं॥ ३०॥
दयाया भगिनी मूर्तिर्धर्मस्यात्मातिथिः स्वयम्।
अग्नेरभ्यागतो मूर्तिः सर्वभूतानि चात्मनः॥ ३०
(इसी प्रकार) बहिन दयाकी, अतिथि धर्मकी, अभ्यागत अग्निकी और जगत्के सभी प्राणी अपने आत्माकी ही मूर्ति—आत्मस्वरूप होते हैं॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 737) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/7/30/