॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.5.33
सध्रीचीनं प्रतीचीनं परस्यानुपथं गताः।
नाद्यापि ते निवर्तन्ते पश्चिमा यामिनीरिव॥ ३३
sadhrīcīnaṃ pratīcīnaṃ parasyānupathaṃ gatāḥ|
nādyāpi te nivartante paścimā yāminīriva|| 33
अर्थ
वे उस पथके पथिक बने, जो अन्तर्मुखी वृत्तिसे प्राप्त होनेयोग्य, अत्यन्त सुन्दर और भगवत्प्राप्तिके अनुकूल है। वे बीती हुई रात्रियोंके समान न तो उस मार्गसे अबतक लौटे हैं और न आगे लौटेंगे ही॥ ३३॥