श्रीनारदजीके उपदेशसे दक्षपुत्रोंकी विरक्ति तथा नारदजीको दक्षका शाप
श्रीशुक उवाच
तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः।
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद् विभुः॥ १
tasyāṃ sa pāñcajanyāṃ vai viṣṇumāyopabṛṃhitaḥ|
haryaśvasaṃjñānayutaṃ putrānajanayad vibhuḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के शक्तिसंचारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पंचजनकी पुत्री असिक्नीसे हर्यश्व नामके दस हजार पुत्र उत्पन्न किये॥ १॥
तस्यां स पाञ्चजन्यां वै विष्णुमायोपबृंहितः।
हर्यश्वसंज्ञानयुतं पुत्रानजनयद् विभुः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्के शक्तिसंचारसे दक्ष प्रजापति परम समर्थ हो गये थे। उन्होंने पंचजनकी पुत्री असिक्नीसे हर्यश्व नामके दस हजार पुत्र उत्पन्न किये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 724) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/5/1/