श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.31

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यच्छक्तयो वदतां वादिनां वै

विवादसंवादभुवो भवन्ति।

कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं ✎ 959 2172

तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने॥ ३१✎ 2172

yacchaktayo vadatāṃ vādināṃ vai

vivādasaṃvādabhuvo bhavanti|

kurvanti caiṣāṃ muhurātmamohaṃ

tasmai namo'nantaguṇāya bhūmne|| 31

अर्थ

प्रभो! आपकी ही शक्तियाँ वादी-प्रतिवादियोंके विवाद और संवाद (ऐकमत्य)-का विषय होती हैं और उन्हें बार-बार मोहमें डाल दिया करती हैं। आप अनन्त अप्राकृत कल्याण-गुणगणोंसे युक्त एवं स्वयं अनन्त हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ३१॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #959 शब्दोंके बीचका स्थान: मुहुरात्ममोहंतस्मै → मुहुरात्ममोहं तस्मै
  • #2172 छूटा या अधिक पाठ: कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं तस्मै / नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने॥ ३१ → कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्ममोहं / तस्मै नमोऽनन्तगुणाय भूम्ने॥ ३१

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