श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.30

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै

यद् यो यथा कुरुते कार्यते च१।

परावरेषां परमं प्राक् प्रसिद्धं

तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम्॥ ३०

yasmin yato yena ca yasya yasmai

yad yo yathā kurute kāryate ca|

parāvareṣāṃ paramaṃ prāk prasiddhaṃ

tad brahma taddheturananyadekam|| 30

अर्थ

भगवन्! आपमें ही यह सारा जगत् स्थित है; आपसे ही निकला है और आपने—और किसीके सहारे नहीं—अपने-आपसे ही इसका निर्माण किया है। यह आपका ही है और आपके लिये ही है। इसके रूपमें बननेवाले भी आप हैं और बनानेवाले भी आप ही हैं। बनने-बनानेकी विधि भी आप ही हैं। आप ही सबसे काम लेनेवाले भी हैं। जब कार्य और कारणका भेद नहीं था, तब भी आप स्वयंसिद्ध स्वरूपसे स्थित थे। इसीसे आप सबके कारण भी हैं। सच्ची बात तो यह है कि आप जीव-जगत‍्के भेद और स्वगतभेदसे सर्वथा रहित एक, अद्वितीय हैं। आप स्वयं ब्रह्म हैं। आप मुझपर प्रसन्‍न हों॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—वा०।

    (मुद्रित पृष्ठ 721)

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