श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तानानयध्वमसतो विमुखान् मुकुन्द-

पादारविन्दमकरन्दरसादजस्रम् ।

निष्किञ्चनैः परमहंसकुलै रसज्ञै-

र्जुष्टाद् गृहे निरयवर्त्मनि बद्धतृष्णान्॥ २८

tānānayadhvamasato vimukhān mukunda-

pādāravindamakarandarasādajasram |

niṣkiñcanaiḥ paramahaṃsakulai rasajñai-

rjuṣṭād gṛhe nirayavartmani baddhatṛṣṇān|| 28

अर्थ

बड़े-बड़े परमहंस दिव्य रसके लोभसे सम्पूर्ण जगत् और शरीर आदिसे भी अपनी अहंता-ममता हटाकर, अकिंचन होकर निरन्तर भगवान् मुकुन्दके पादारविन्दका मकरन्द-रस पान करते रहते हैं। जो दुष्ट उस दिव्य रससे विमुख हैं और नरकके दरवाजे घर-गृहस्थीकी तृष्णाका बोझा बाँधकर उसे ढो रहे हैं, उन्हींको मेरे पास बार-बार लाया करो॥ २८॥

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