बड़े-बड़े विद्वानोंकी बुद्धि कभी भगवान्की मायासे मोहित हो जाती है। वे कर्मोंके मीठे-मीठे फलोंका वर्णन करनेवाली अर्थवादरूपिणी वेदवाणीमें ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि बड़े-बड़े कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नामकी महिमाको नहीं जानते। यह कितने खेदकी बात है॥ २५॥✎ 502
प्रायेण वेद तदिदं न महाजनोऽयं
देव्या विमोहितमतिर्बत माययालम्।
त्रय्यां जडीकृतमतिर्मधुपुष्पितायां
वैतानिके महति कर्मणि युज्यमानः॥ २५
बड़े-बड़े विद्वानोंकी बुद्धि कभी भगवान्की मायासे मोहित हो जाती है। वे कर्मोंके मीठे-मीठे फलोंका वर्णन करनेवाली अर्थवादरूपिणी वेदवाणीमें ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि बड़े-बड़े कर्मोंमें ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नामकी महिमाको नहीं जानते। यह कितने खेदकी बात है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.3.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 715) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/3/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)