श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.24

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एतावतालमघनिर्हरणाय पुंसां

सङ्कीर्तनं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम्।

विक्रुश्य पुत्रमघवान् यदजामिलोऽपि

नारायणेति म्रियमाण इयाय मुक्तिम्॥ २४

etāvatālamaghanirharaṇāya puṃsāṃ

saṅkīrtanaṃ bhagavato guṇakarmanāmnām|

vikruśya putramaghavān yadajāmilo'pi

nārāyaṇeti mriyamāṇa iyāya muktim|| 24

अर्थ

भगवान्‌के गुण, लीला और नामोंका भलीभाँति कीर्तन मनुष्योंके पापोंका सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा फल नहीं है, क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिलने मरनेके समय चंचल चित्तसे अपने पुत्रका नाम ‘नारायण’ उच्चारण किया। इस नामाभासमात्रसे ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्तिकी प्राप्ति भी हो गयी॥ २४॥

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