श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.19

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं

न वै विदुर्ऋषयो नापि देवाः।✎ 1073 1074

न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः

कुतश्‍च विद्याधरचारणादयः॥ १९

dharmaṃ tu sākṣādbhagavatpraṇītaṃ

na vai vidur:ṛṣayo nāpi devāḥ|

na siddhamukhyā asurā manuṣyāḥ

kutaśca vidyādharacāraṇādayaḥ|| 19

अर्थ

स्वयं भगवान्‌ने ही धर्मकी मर्यादाका निर्माण किया है। उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही। ऐसी स्थितिमें मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं॥ १९॥✎ 501

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #501 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1073 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदुऋर्षयो → विदुऋर्ऋषयो
  • #1074 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विदुऋर्ऋषयो → विदुर्ऋषयो

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