स्वयं भगवान्ने ही धर्मकी मर्यादाका निर्माण किया है। उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही। ऐसी स्थितिमें मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं॥ १९॥✎ 501
धर्मं तु साक्षाद्भगवत्प्रणीतं
न वै विदुर्ऋषयो नापि देवाः।
न सिद्धमुख्या असुरा मनुष्याः
कुतश्च विद्याधरचारणादयः॥ १९
स्वयं भगवान्ने ही धर्मकी मर्यादाका निर्माण किया है। उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही। ऐसी स्थितिमें मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.3.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 714) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/3/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)