॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.3.14
अहं महेन्द्रो निर्ऋतिः प्रचेताः ✎ 1071 1072
सोमोऽग्निरीशः पवनोऽर्को विरिञ्चः।
आदित्यविश्वे वसवोऽथ साध्या
मरुद्गणा रुद्रगणाः ससिद्धाः॥ १४
ahaṃ mahendro nir:ṛtiḥ pracetāḥ
somo'gnirīśaḥ pavano'rko viriñcaḥ|
ādityaviśve vasavo'tha sādhyā
marudgaṇā rudragaṇāḥ sasiddhāḥ|| 14
अर्थ
दूतो! मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रुद्र, रजोगुण एवं तमोगुणसे रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता—सब-के-सब सत्त्वप्रधान होनेपर भी उनकी मायाके अधीन हैं तथा भगवान् कब क्या किस रूपमें करना चाहते हैं—इस बातको नहीं जानते। तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है॥ १४-१५॥✎ 500 1362 1363