श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.3.14

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

अहं महेन्द्रो निर्ऋतिः प्रचेताः ✎ 1071 1072

सोमोऽग्‍निरीशः पवनोऽर्को विरिञ्चः।

आदित्यविश्वे वसवोऽथ साध्या

मरुद्गणा रुद्रगणाः ससिद्धाः॥ १४

ahaṃ mahendro nir:ṛtiḥ pracetāḥ

somo'gnirīśaḥ pavano'rko viriñcaḥ|

ādityaviśve vasavo'tha sādhyā

marudgaṇā rudragaṇāḥ sasiddhāḥ|| 14

अर्थ

दूतो! मैं, इन्द्र, निर्ऋति, वरुण, चन्द्रमा, अग्‍नि, शंकर, वायु, सूर्य, ब्रह्मा, बारहों आदित्य, विश्वेदेवता, आठों वसु, साध्य, उनचास मरुत्, सिद्ध, ग्यारहों रुद्र, रजोगुण एवं तमोगुणसे रहित भृगु आदि प्रजापति और बड़े-बड़े देवता—सब-के-सब सत्त्वप्रधान होनेपर भी उनकी मायाके अधीन हैं तथा भगवान् कब क्या किस रूपमें करना चाहते हैं—इस बातको नहीं जानते। तब दूसरोंकी तो बात ही क्या है॥ १४-१५॥✎ 500 1362 1363

यह अर्थ श्लोक 14–15 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #500 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #1071 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति: → निऋर्ऋतिः
  • #1072 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति: → निर्ऋतिः
  • #1362 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ति, → निऋर्ऋति,
  • #1363 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निऋर्ऋति, → निर्ऋति,

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