श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.45

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

एवं स विप्लावितसर्वधर्मा

दास्याः पतिः पतितो गर्ह्यकर्मणा।

निपात्यमानो निरये हतव्रतः

सद्यो विमुक्तो भगवन्‍नाम गृह्णन्॥ ४५

evaṃ sa viplāvitasarvadharmā

dāsyāḥ patiḥ patito garhyakarmaṇā|

nipātyamāno niraye hatavrataḥ

sadyo vimukto bhagavannāma gṛhṇan|| 45

अर्थ

परीक्षित्! अजामिलने दासीका सहवास करके सारा धर्म-कर्म चौपट कर दिया था। वे अपने निन्दित कर्मके कारण पतित हो गये थे। नियमोंसे च्युत हो जानेके कारण उन्हें नरकमें गिराया जा रहा था। परन्तु भगवान्‌के एक नामका उच्चारण करनेमात्रसे वे उससे तत्काल मुक्त हो गये॥ ४५॥

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