श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तमश्लोकनाम यत्।

सङ्कीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानलः॥ १८

ajñānādathavā jñānāduttamaślokanāma yat|

saṅkīrtitamaghaṃ puṃso dahededho yathānalaḥ|| 18

अर्थ

यमदूतो! जैसे जान या अनजानमें ईंधनसे अग्‍निका स्पर्श हो जाय तो वह भस्म हो ही जाता है, वैसे ही जान-बूझकर या अनजानमें भगवान्‌के नामोंका संकीर्तन करनेसे मनुष्यके सारे पाप भस्म हो जाते हैं॥ १८॥

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