श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.17

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तैस्तान्यघानि पूयन्ते तपोदानजपादिभिः।

नाधर्मजं तद‍्धृदयं तदपीशाङ्‌घ्रिसेवया॥ १७

taistānyaghāni pūyante tapodānajapādibhiḥ|

nādharmajaṃ taddhṛdayaṃ tadapīśāṅghrisevayā|| 17

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि उन तपस्या, दान, जप आदि प्रायश्चित्तोंके द्वारा वे पाप नष्ट हो जाते हैं। परन्तु उन पापोंसे मलिन हुआ उसका हृदय शुद्ध नहीं होता। भगवान्‌के चरणोंकी सेवासे वह भी शुद्ध हो जाता है॥ १७॥

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