श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.11

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

न निष्कृतैरुदितैर्ब्रह्मवादिभि-

स्तथा विशुद्ध्यत्यघवान् व्रतादिभिः।

यथा हरेर्नामपदैरुदाहृतै-

स्तदुत्तमश्लोकगुणोपलम्भकम् ॥ ११

na niṣkṛtairuditairbrahmavādibhi-

stathā viśuddhyatyaghavān vratādibhiḥ|

yathā harernāmapadairudāhṛtai-

staduttamaślokaguṇopalambhakam || 11

अर्थ

बड़े-बड़े ब्रह्मवादी ऋषियोंने पापोंके बहुत-से प्रायश्चित्त—कृच्छ्र, चान्द्रायण आदि व्रत बतलाये हैं; परन्तु उन प्रायश्चित्तोंसे पापीकी वैसी जड़से शुद्धि नहीं होती, जैसी भगवान्‌के नामोंका, उनसे गुम्फित पदोंका† उच्चारण करनेसे होती है। क्योंकि वे नाम पवित्रकीर्ति भगवान्‌के गुणोंका ज्ञान करानेवाले हैं॥ ११॥✎ 496

टिप्पणियाँ

  1. †

    ‘नामपदैः’ कहनेका यह अभिप्राय है कि भगवान्का केवल नाम ‘राम-राम’, ‘कृष्ण-कृष्ण’, ‘हरि-हरि’, ‘नारायण नारायण’ अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये—पापोंकी निवृत्तिके लिये पर्याप्त है। ‘नमः नमामि’ इत्यादि क्रिया जोड़नेकी भी कोई आवश्यकता नहीं है। नामके साथ बहुवचनका प्रयोग—भगवान्‌के नाम बहुत-से हैं, किसीका भी संकीर्तन कर ले, इस अभिप्रायसे है। एक व्यक्ति सब नामोंका उच्चारण करे, इस अभिप्रायसे नहीं। क्योंकि भगवान्‌के नाम अनन्त हैं; सब नामोंका उच्चारण सम्भव ही नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान्‌के एक नामका उच्चारण करनेमात्रसे सब पापोंकी निवृत्ति हो जाती है। पूर्ण विश्वास न होने तथा नामोच्चारणके पश्चात् भी पाप करनेके कारण ही उसका अनुभव नहीं होता।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 704)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #496 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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