॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.2.10
सर्वेषामप्यघवतामिदमेव सुनिष्कृतम्।
नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मतिः॥ १०
sarveṣāmapyaghavatāmidameva suniṣkṛtam|
nāmavyāharaṇaṃ viṣṇoryatastadviṣayā matiḥ|| 10
अर्थ
चोर, शराबी, मित्रद्रोही, ब्रह्मघाती, गुरुपत्नीगामी, ऐसे लोगोंका संसर्गी; स्त्री, राजा, पिता और गायको मारनेवाला, चाहे जैसा और चाहे जितना बड़ा पापी हो, सभीके लिये यही—इतना ही सबसे बड़ा प्रायश्चित्त है कि भगवान्के नामोंका उच्चारण* किया जाय; क्योंकि भगवन्नामोंके उच्चारणसे मनुष्यकी बुद्धि भगवान्के गुण, लीला और स्वरूपमें रम जाती है और स्वयं भगवान्की उसके प्रति आत्मीय बुद्धि हो जाती है॥ ९-१०॥✎ 496
टिप्पणियाँ
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इस प्रसंगमें ‘नाम-व्याहरण’ का अर्थ नामोच्चारणमात्र ही है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—
यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्।
ऋणमेतत् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति॥
‘मेरे दूर होनेके कारण द्रौपदीने जोर-जोरसे ‘गोविन्द, गोविन्द’ इस प्रकार करुण क्रन्दन करके मुझे पुकारा। वह ऋण मेरे ऊपर बढ़ गया है और मेरे हृदयसे उसका भार क्षणभरके लिये भी नहीं हटता।