श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं श्रिया सह।

तन्‍निःसार्योपहरणं दत्त्वाऽऽचमनमर्चयेत्॥ १५

ityabhiṣṭūya varadaṃ śrīnivāsaṃ śriyā saha|

tanniḥsāryopaharaṇaṃ dattvā''camanamarcayet|| 15

अर्थ

परीक्षित्! इस प्रकार परम वरदानी भगवान् लक्ष्मी-नारायणकी स्तुति करके वहाँसे नैवेद्य हटा दे और आचमन कराके पूजा करे॥ १५॥✎ 558 559 560 561 1614

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #558 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #559 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #560 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #561 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1614 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्म-शुद्धि → आत्मशुद्धि

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