श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.19.14

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ।

तथा म उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः॥ १४

yathā yuvāṃ trilokasya varadau parameṣṭhinau|

tathā ma uttamaśloka santu satyā mahāśiṣaḥ|| 14

अर्थ

प्रभो! आपकी कीर्ति पवित्र है। आप दोनों ही त्रिलोकीके वरदानी परमेश्‍वर हैं। अतः मेरी बड़ी-बड़ी आशा-अभिलाषाएँ आपकी कृपासे पूर्ण हों’॥ १४॥

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