श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.28

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

भक्‍त्या परमया राजन् मनोज्ञैर्वल्गुभाषितैः।

मनो जग्राह भावज्ञा सुस्मितापाङ्गवीक्षणैः॥ २८

bhaktyā paramayā rājan manojñairvalgubhāṣitaiḥ|

mano jagrāha bhāvajñā susmitāpāṅgavīkṣaṇaiḥ|| 28

अर्थ

वह अपने पतिदेवके हृदयका एक-एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी॥ २८॥

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