वह अपने पतिदेवके हृदयका एक-एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी॥ २८॥
भक्त्या परमया राजन् मनोज्ञैर्वल्गुभाषितैः।
मनो जग्राह भावज्ञा सुस्मितापाङ्गवीक्षणैः॥ २८
वह अपने पतिदेवके हृदयका एक-एक भाव जानती रहती थी और परम प्रेमभाव, मनोहर एवं मधुर भाषण तथा मुसकानभरी तिरछी चितवनसे उनका मन अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 794) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/28/