दिति अपने मनमें ऐसा विचार करके सेवा-शुश्रूषा, विनय-प्रेम और जितेन्द्रियता आदिके द्वारा निरन्तर अपने पतिदेव कश्यपजीको प्रसन्न रखने लगी॥ २७॥
इति भावेन सा भर्तुराचचारासकृत्प्रियम्।
शुश्रूषयानुरागेण प्रश्रयेण दमेन च॥ २७
दिति अपने मनमें ऐसा विचार करके सेवा-शुश्रूषा, विनय-प्रेम और जितेन्द्रियता आदिके द्वारा निरन्तर अपने पतिदेव कश्यपजीको प्रसन्न रखने लगी॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 794) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/27/