श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.11

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

पार्वत्युवाच

अयं किमधुना लोके शास्ता दण्डधरः प्रभुः।

अस्मद्विधानां दुष्टानां निर्लज्जानां च विप्रकृत्॥ ११

ayaṃ kimadhunā loke śāstā daṇḍadharaḥ prabhuḥ|

asmadvidhānāṃ duṣṭānāṃ nirlajjānāṃ ca viprakṛt|| 11

अर्थ

पार्वतीजी बोलीं—अहो! हम-जैसे दुष्ट और निर्लज्जोंका दण्डके बलपर शासन एवं तिरस्कार करनेवाला प्रभु इस संसारमें यही है क्या?॥ ११॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें