श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.10

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

इत्यतद्वीर्यविदुषि ब्रुवाणे बह्वशोभनम्।

रुषाऽऽह देवी धृष्टाय निर्जितात्माभिमानिने॥ १०

ityatadvīryaviduṣi bruvāṇe bahvaśobhanam|

ruṣā''ha devī dhṛṣṭāya nirjitātmābhimānine|| 10

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् शंकरकी बुद्धि अगाध है। चित्रकेतुका यह कटाक्ष सुनकर वे हँसने लगे, कुछ भी बोले नहीं। उस सभामें बैठे हुए उनके अनुयायी सदस्य भी चुप रहे। चित्रकेतुको भगवान् शंकरका प्रभाव नहीं मालूम था। इसीसे वे उनके लिये बहुत कुछ बुरा-भला बक रहे थे। उन्हें इस बातका घमण्ड हो गया था कि ‘मैं जितेन्द्रिय हूँ।’ पार्वतीजीने उनकी यह धृष्टता देखकर क्रोधसे कहा—॥ ९-१०॥

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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