श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.50

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

यन्‍नारदाङ्गिरोभ्यां ते व्याहृतं मेऽनुशासनम्।✎ 1095

संसिद्धोऽसि तया राजन् विद्यया दर्शनाच्च मे॥ ५०

yannāradāṅgirobhyāṃ te vyāhṛtaṃ me'nuśāsanam|

saṃsiddho'si tayā rājan vidyayā darśanācca me|| 50

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—चित्रकेतो! देवर्षि नारद और महर्षि अंगिराने तुम्हें मेरे सम्बन्धमें जिस विद्याका उपदेश दिया है, उससे और मेरे दर्शनसे तुम भलीभाँति सिद्ध हो चुके हो ॥ ५०॥✎ 545

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #545 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1095 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): यन्‍नारदांङ्ग‌िरोभ्यां → यन्‍नारदाङ्गिरोभ्यां

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