श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.30

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

मृणालगौरं शितिवाससं स्फुर-

त्किरीटकेयूरकटित्रकङ्कणम् ।

प्रसन्‍नवक्‍त्रारुणलोचनं वृतं

ददर्श सिद्धेश्‍वरमण्डलैः प्रभुम्॥ ३०

mṛṇālagauraṃ śitivāsasaṃ sphura-

tkirīṭakeyūrakaṭitrakaṅkaṇam |

prasannavaktrāruṇalocanaṃ vṛtaṃ

dadarśa siddheśvaramaṇḍalaiḥ prabhum|| 30

अर्थ

उन्होंने देखा कि भगवान् शेषजी सिद्धेश्‍वरोंके मण्डलमें विराजमान हैं। उनका शरीर कमलनालके समान गौरवर्ण है। उसपर नीले रंगका वस्त्र फहरा रहा है। सिरपर किरीट, बाँहोंमें बाजूबंद, कमरमें करधनी और कलाईमें कंगन आदि आभूषण चमक रहे हैं। नेत्र रतनारे हैं और मुखपर प्रसन्‍नता छा रही है॥ ३०॥✎ 542

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #542 शब्दोंके बीचका स्थान: शेषभगवान् की → शेषभगवान्‌की

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