श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यस्मिन्‍निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते।

मृण्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः॥ २२

yasminnidaṃ yataścedaṃ tiṣṭhatyapyeti jāyate|

mṛṇmayeṣviva mṛjjātistasmai te brahmaṇe namaḥ|| 22

अर्थ

यह कार्य-कारणरूप जगत् जिनसे उत्पन्‍न होता है, जिनमें स्थित है और जिनमें लीन होता है तथा जो मिट्टीकी वस्तुओंमें व्याप्त मृत्तिकाके समान सबमें ओत-प्रोत हैं—उन परब्रह्मस्वरूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २२॥

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