श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.21

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

वचस्युपरतेऽप्राप्य य एको मनसा सह।

अनामरूपश्चिन्मात्रः सोऽव्यान्‍नः सदसत्परः॥ २१

vacasyuparate'prāpya ya eko manasā saha|

anāmarūpaścinmātraḥ so'vyānnaḥ sadasatparaḥ|| 21

अर्थ

मनसहित वाणी आपतक न पहुँचकर बीचसे ही लौट आती है। उसके उपरत हो जानेपर जो अद्वितीय, नाम-रूपरहित, चेतनमात्र और कार्य-कारणसे परेकी वस्तु रह जाती है—वह हमारी रक्षा करे॥ २१॥

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