श्रीशुकदेवजी कहते हैं—वह जीवात्मा इस प्रकार कहकर चला गया। उसके सगे-सम्बन्धी उसकी बात सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। उनका स्नेह-बन्धन कट गया और उसके मरनेका शोक भी जाता रहा॥ १२॥
इत्युदीर्य गतो जीवो ज्ञातयस्तस्य ते तदा।
विस्मिता मुमुचुः शोकं छित्त्वाऽऽत्मस्नेहशृङ्खलाम्॥ १२
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—वह जीवात्मा इस प्रकार कहकर चला गया। उसके सगे-सम्बन्धी उसकी बात सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए। उनका स्नेह-बन्धन कट गया और उसके मरनेका शोक भी जाता रहा॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 779) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/12/