श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.15.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः।

देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः॥ २५

ayaṃ hi dehino deho dravyajñānakriyātmakaḥ|

dehino vividhakleśasantāpakṛdudāhṛtaḥ|| 25

अर्थ

जीवात्माकी यह देह—जो पंचभूत, ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंका संघात है—जीवको विविध प्रकारके क्लेश और सन्ताप देनेवाली कही जाती है॥ २५॥✎ 1985

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1985 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): जीवात्माका → जीवात्माकी

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