॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.15.24
दृश्यमाना विनार्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः।
कर्मभिर्ध्यायतो नानाकर्माणि मनसोऽभवन्॥ २४
dṛśyamānā vinārthena na dṛśyante manobhavāḥ|
karmabhirdhyāyato nānākarmāṇi manaso'bhavan|| 24
अर्थ
शूरसेन! अतएव ये सभी शोक, मोह, भय और दुःखके कारण हैं, मनके खेल-खिलौने हैं, सर्वथा कल्पित और मिथ्या हैं; क्योंकि ये न होनेपर भी दिखायी पड़ रहे हैं। यही कारण है कि ये एक क्षण दीखनेपर भी दूसरे क्षण लुप्त हो जाते हैं। ये गन्धर्वनगर, स्वप्न, जादू और मनोरथकी वस्तुओंके समान सर्वथा असत्य हैं। जो लोग कर्म-वासनाओंसे प्रेरित होकर विषयोंका चिन्तन करते रहते हैं; उन्हींका मन अनेक प्रकारके कर्मोंकी सृष्टि करता है॥ २३-२४॥✎ 1985