धायने सोते हुए बालकके पास जाकर देखा कि उसके नेत्रोंकी पुतलियाँ उलट गयी हैं। प्राण, इन्द्रिय और जीवात्माने भी उसके शरीरसे विदा ले ली है। यह देखते ही ‘हाय रे! मैं मारी गयी!’ इस प्रकार कहकर वह धरतीपर गिर पड़ी॥ ४६॥✎ 540
सा शयानमुपव्रज्य दृष्ट्वा चोत्तारलोचनम्।
प्राणेन्द्रियात्मभिस्त्यक्तं हतास्मीत्यपतद्भुवि॥ ४६
धायने सोते हुए बालकके पास जाकर देखा कि उसके नेत्रोंकी पुतलियाँ उलट गयी हैं। प्राण, इन्द्रिय और जीवात्माने भी उसके शरीरसे विदा ले ली है। यह देखते ही ‘हाय रे! मैं मारी गयी!’ इस प्रकार कहकर वह धरतीपर गिर पड़ी॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.14.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 772) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/14/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)