सूर्यादि ग्रहोंकी उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गतिमें जितना समय लगता है, उतने दिनोंमें अर्थात् एक वर्षमें वृत्रवधका योग उपस्थित होनेपर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्रने उसकी गरदनको सब ओरसे काटकर भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥✎ 1950
वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः
कृन्तन् समन्तात् परिवर्तमानः।
न्यपातयत् तावदहर्गणेन
यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३
सूर्यादि ग्रहोंकी उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गतिमें जितना समय लगता है, उतने दिनोंमें अर्थात् एक वर्षमें वृत्रवधका योग उपस्थित होनेपर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्रने उसकी गरदनको सब ओरसे काटकर भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.12.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 764) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/12/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1950 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उँचा → ऊँचा
#2173 छूटा या अधिक पाठ: न्यपातयत् तावदहर्गणेन यो / ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३ → न्यपातयत् तावदहर्गणेन / यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३