श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.12.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः

कृन्तन् समन्तात् परिवर्तमानः।

न्यपातयत् तावदहर्गणेन ✎ 2173

यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३✎ 2173

vajrastu tatkandharamāśuvegaḥ

kṛntan samantāt parivartamānaḥ|

nyapātayat tāvadahargaṇena

yo jyotiṣāmayane vārtrahatye|| 33

अर्थ

सूर्यादि ग्रहोंकी उत्तरायण-दक्षिणायनरूप गतिमें जितना समय लगता है, उतने दिनोंमें अर्थात् एक वर्षमें वृत्रवधका योग उपस्थित होनेपर घूमते हुए उस तीव्र वेगशाली वज्रने उसकी गरदनको सब ओरसे काटकर भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥✎ 1950

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1950 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उँचा → ऊँचा
  • #2173 छूटा या अधिक पाठ: न्यपातयत् तावदहर्गणेन यो / ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३ → न्यपातयत् तावदहर्गणेन / यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये॥ ३३

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें